बिहार में चल रहा एशिया का सबसे बड़ा मेला, जाने खास बातें इस मेलें के बारें में

हर साल कार्तिक पूर्णिमा पर बिहार के सोनपुर में लगने वाला यह मेला नवंबर-दिसंबर में लगता है। कार्तिक गंगा स्नान के साथ ही सोनपुर मेले के तंबू गड़ जाते हैं।

 


गंगा स्नान के लिए नारायणी (गंडक) और गंगा के संगम पर लाखों लोगों की भीड़ उमड़ती है। पश्चिम की तरफ सोनपुर और पूरब की तरफ हाजीपुर में नदी तट पर कई किलोमीटर तक श्रद्धालुओं की कतार रहती है।





सोनपुर मेले में घोड़ा बेचने आए व्यापारी खरीदारों को पहले घुड़सवारी का करतब भी दिखाते हैं।





गंगा-गंडक नदी के संगम पर होने वाले इस मेले में हाथी का करतब देखते विदेशी कलाकार यादें संजोकर ले जाते हैं। हालांकि सरकार यहां हाथियों की खरीद-फरोख्त पर रोक लगा चुकी है, बावजूद ये मेला हाथी मेला के नाम से ही मशहूर है।





मेले की सबसे खास बात है यहां होने वाला डांस। ग्रुप में आईं लड़कियां दर्शकों के सामने डांस करती हैं। ये नजारा देखने लायक होता है। तस्वीरों में देखिए ऐसे ही कुछ नजारे।




यहां आने वाली डांसरों का डांस ही अब मेले का मुख्य आकर्षण बन गया है। इन्हें देखने युवाओं की भीड़ उमड़ती है। डांसरों को भीड़ से बचाने के लिए बकायदा तार लगाए गए हैं। युवाओं के सिर डांसरों का क्रेज देखने लायक बनता है।




मेले में खाने के लिए एक से बढ़कर एक चीज मिलती है। यहां की चाट बेहद स्वादिष्ट होती है। जितनी यह स्वादिष्ट होती है, दिखने में भी उतनी ही आकर्षक होती है।






गंगा स्नान के साथ ही सोनपुर मेला शुरू हो जाता है जो अब एक महीने तक चलता है। पहले आधिकारिक तौर पर मेला सिर्फ 15 दिनों का होता था। लेकिन यह आगे भी 20 से 30 दिनों तक चलता रहता था।




सोनपुर मेले में जब हाजीपुर की ओर से पुराने लोहे पुल से गुजरते हैं तो सबसे पहले आता है हाथी बाजार। मेले में बिकने आए हाथियों को महावत गंडक नदी में नहलाने के बाद उन्हें रंग रोगन से सजाते हैं। उनकी पीठ पर रंगीन चंदोबे लगाए जाते हैं।




मेले में हर साल ये खबर बनती है कि अमुक हाथी इतना महंगा बिका। हालांकि अब हाथी पालने का शौक कम होता जा रहा है, पर मेले में अभी हर साल सैकड़ों हाथी बिकने आते हैं। बैल, गाय भैंस, ऊंट भी बिकता है। चिड़ियों के लिए तो अलग से चिड़िया बाजार है यहां। भले मेला खत्म हो जाए चिड़िया बाजार सालों भर चिड़िया बाजार ही कहलाता है।




सोनपुर मेला उसी पौराणिक जगह पर लगता है जहां कभी गज और ग्राह में भयंकर युद्ध हुआ था। गज (हाथी) विष्णु का भक्त था। ऐसी मान्यता है कि उसे बचाने के लिए विष्णु स्वयं यहां आए थे। इसलिए ये हरिहर क्षेत्र है। इलाके में लोग उसे हरिहर क्षेत्र का मेला कहते हैं। तो वज्जिका के अपभ्रंश में गांव-गांव के लोग छतर मेला कहते हैं।




मेले का खास आकर्षण मीना बाजार होता है। इसमें कास्मेटिक के सामान बिकते हैं। लखनऊ का मीना बाजार, मुंबई का मीना बाजार तो दिल्ली का मीना बाजार घूमते जाइए। बिहार में एक शहर है लखीसराय। यह शहर सुहाग की निशानी सिंदूर बनाने के लिए जाना जाता है। सोनपुर मेले में कई सिंदूर कंपनियां स्टाल लगाती हैं। यहां खाने के कुछ सामान ऐसे मिलेंगे जो आपको और कहीं देखने को नहीं मिलेंगे।

बिहार की राजधानी पटना से 25 किलोमीटर दूर लगने वाले एशिया के सबसे बड़े मेले का प्रमुख आकर्षण होता है कश्मीर से आने वाली कश्मीरी शॉल की दुकानें। कश्मीरी शाल के कद्रदान यहां जरूर पहुंचते हैं। अलग-अलग जिलों के खादी भंडार से स्टाल भी मेले में आते हैं। पहले यह मेला हाजीपुर में होता था। बाद में मुगल बादशाह औरंगजेब के आदेश से मेला सोनपुर में ही लगने लगा।




सोनपुर मेले में लकड़ी के फर्नीचरों का भी बाजार होता है। मेला खत्म होने तक फर्नीचर सस्ते होने लगते हैं। कई लोग इंतजार करते हैं सस्ती खरीदारी का। पुरानी पीढ़ी के लोग बताते हैं कि कभी मेले में सब कुछ बिकता था। यहां तक की गुलाम भी बिकते थे। बदलते वक्त के साथ मेला बदल रहा है। मेले में आने वाले तमाम उत्पाद अब बाजार में भी मिलने लगे हैं। पर सोनपुर मेले का आकर्षण कम नहीं हुआ है।



एक समय तक सोनपुर मेले में थियेटर और कैबरे खास आकर्षण होते थे। कानपुर का गुलाब थियेटर, शोभा थियेटयर की खूब धूम रहती थी। पर बाद में अश्लीलता का आरोप लगने पर इनकी आवक बंद हो गई। यहां हाथों से बने सामान भी खासे लोकप्रिय हैं।
साभार: ब्लॉग daanapaani , Image source :ibnlive


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