दिल बड़ा या दिमाग? हजारों साल की बहस के बाद क्या​ हुआ तय? जानिए

मानव की उत्पत्ति का इतिहास हमेशा से ही शोध का विषय रहा है। इन सबमें मानव मस्तिष्क ने शोधकर्ताओं को अपनी ओर सबसे ज्यादा आकर्षित किया है। माना जाता है कि हम मनुष्यों में दिल और दिमाग की लड़ाई हमेशा से ही चलती आ रही है। कुछ लोग दिल से फैसला लेते है, तो कुछ दिमाग से। लेकिन अगर आप से ये पूछा जाए कि इंसानों में मस्तिष्क और सोचने की क्षमता का विकास कब हुआ होगा , तो आपका जवाब क्या होगा? कई लोगों का जवाब पांच से दस हजार साल पहले तक का होगा।


लेकिन एक शोध में यह बात सामने आयी है कि इंसानों में मस्तिष्क का विकास 75,000 साल पहले ही हो चुका है। यह शोध कोलोराडो विश्वविद्यालय के शोधकर्ता जॉन हॉफकर ने किया है। उन्होंने बताया कि मस्तिष्क में बदलाव ने पहली बार सोचने की असीमित क्षमता का विकास किया। इस सुपर ब्रेन की वजह से ही हमें पहली बार नये अन्वेषणों का पता चला और विलक्षणता हासिल हुई।

इतना ही नही हॉफकर का कहना है कि मस्तिष्क हमारे जीवन में इतना महत्वपूर्ण है हम जो विभिन्न तरह के अंतरिक्ष में यान भेज रहे है वो दिमाग के बिना मुमकिन ही नही हो पाता।


एक छोटी-सी घड़ी से लेकर विशाल जहाज सबकी खोज में मस्तिष्क की भूमिका काफी महत्वपूर्ण है। हॉफकर ने बताया कि मानव मस्तिष्क में उत्तेजना या पहली हरकत लगभग 1.6 मिलियन यानी 16 लाख साल पहले हुई। और यह पहली प्रतिक्रिया मानवों के पत्थर की कुल्हाड़ी के प्रयोग में लेने का नतीजा है। इससे स्पष्ट रुप से यह साबित हो जाता है कि उसी समय से मस्तिष्क के इस्तेमाल से पहली बार किसी चीज की खोज या निर्माण होना शुरू हुआ। हॉफकर का कहना है कि 75,000 साल पहले अफ्रीका में काफी तेजी से लोगों का इकठ्ठा होना शुरू हो गया था और इस क्रम में मस्तिष्क का भी काफी तेजी से विकास होना शुरू हुआ।

4000 बीसी से पहले का है म​स्तिष्क का लिखित इतिहास
ईसा से 4000 वर्ष पूर्व : एक अज्ञात लेखक के अनुसार अफीम का सेवन बंद किया जिसके बाद उसके दिमाग में अजीब हलचल हुई और मनुष्य के व्यवहार में बदलाव आया। 

2500 ईसा पूर्व : प्राचीन मिस्र के लोगों के अनुसार दिल को मनुष्य के शरीर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है। पुस्तक 'बुक ऑफ डेड' के अनुसार दिमाग एक असाधारण अंग माना जाता था।

2000 ईसा पूर्व : इस समय से जुड़े कई स्थलों पर दिमाग में ट्रेपैनेशन यानी एक तरह की शल्य क्रिया के प्रमाण मिले हैं। तांबे और आग्नेय पत्थरों की मदद से दिमाग में छेद किया जाता था। दक्षिण अमरीका के इंकन-पूर्व सभ्यता के काल में ऐसी शल्य क्रिया आम थी।

450 ईसा पूर्व : अल्केमेऑन नामक ग्रीक चिकित्सक ने पहली बार ज्ञात रूप से अपने बातों को साबित करने की कोशिश की। इसके लिए उन्होने पशुओं की शल्य चिकित्सा की शुरुआत की। उनका मानना था कि दिल नहीं दिमाग संवेदना और स्वाद का केंद्र था। जबकि इस समय तक के चिकित्सकों का मानना था कि दिल ही शरीर की महत्वपूर्ण क्रियाकलापों का केंद्र है। अल्केमेऑन ने यह भी सिद्धांत रखा था कि रोशनी आंखों में ही होती है। 18वीं शताब्दी के मध्य तक चिकित्सक इसे ही सच मानते थे।

335 ईसा पूर्व : अरस्तू के अनुसार दिल ही संवेदना और स्वाद का केंद्र था और दिमाग बस दिल के रेडियटर की तरह काम करता था।

300 ईसा पूर्व : हीरोफिलियस और इरैसिस्ट्रेटस ने सबसे पहले मानव शरीर का चीडफ़ाड़ करके पशुओं के शरीर से तुलना की। इन्होंने सबसे पहले विस्तार से दिल और दिमाग का वर्णन किया और बताया कि दिमाग ही शीर्ष पर है। इन्होंने तंत्रिका तंत्र (नर्वस सिस्टम) की खोज भी की। मोटर और सेंसरी नव्र्स का अंतर भी बताया।

170 ईसा पूर्व : गैलेने नामक रोमन चिकित्सक ने सिद्धांत प्रकट किया कि दिमाग में खून समेत चार तरह के द्रव होते हैं। गैलेने ने यह भी बताया कि ये चार द्रव ही मानव के स्वभाव को नियंत्रित करते हैं। यादें, भावनाएं, समझ और संज्ञान यानी अनुभूति के भी दिमाग से ही जुड़े होने की बात उन्होंने ही सबसे पहले कही। गैलेने के विचारों का प्रभाव लगभग 1200 वर्षों तक रहा।

1100-1500 : लगभग 400 वर्षों तक दिमाग से जुड़े अध्ययन रुके रहे। इस दौरान चर्च ने शल्य क्रिया और चीडफ़ाड़ पर रोक लगा दी थी।

1543 : न्यूरोसाइंस की संभवत पहली किताब 'दे ह्युमनी कॉर्पोरिस फ्रैब्रिका' छपी। एंड्रियस वेसैलियस नामक चिकित्सक ने इसमें नाड़ी और दिमाग की तस्वीरों के साथ विस्तार से समझाया। साबित किया कि दिल की नाडिय़ां तो जानवरों में भी होती हैं लेकिन उनमें भावनाएं और तर्क नहीं होता। इसलिए दिल नहीं दिमाग ही सबकुछ है।

1649 : एक फ्रेंच दार्शनिक ने यह विचार प्रकट किया कि दिमाग एक मशीन की तरह काम करता है।

1664 : ऑक्सफोर्ड के प्रोफेसर थॉमस विलिस ने दिमाग पहले मोनोग्राफ (लेख)की रचना की। बताया कि दिमाग का 70 फीसदी हिस्सा सेरेब्रल से बना है जो भावनाओं और अन्य क्रियाकलाप को नियंत्रित करता है। चलने-बोलने को नियंत्रित करने वाले दिमाग से अलग होता है। न्यूरोलॉजी शब्द का पहली बार उपयोग किया।

1817 : जेम्स पार्किंसन ने हाथ-पैर कांपन से जुड़ी बीमारी को दिमाग से जुड़ा बताया। बाद में इसका नाम उनपर ही पड़ा। वैज्ञानिक आज भी इसपर शोध कर रहे हैं कि कैसे दिमाग के विचार हमारे शरीर के हलचल को नियंत्रित करते हैं।

1848 : फिनियास गेज नाम के एक मजदूर के सिर के अगले हिस्से में एक रॉड घुसा। इलाज के बाद वह अधिक बुद्धिमान हो गया। रेल की पटरियों के लिए एक विस्फोट के दौरान एक रॉड गेज के सिर में मस्तिष्क के सामने वाले लोब नामक हिस्से में घुस गई। काफी दिनों के बाद वह ठीक हो गया। लेकिन हादसे के पहले एक शांत स्वभाव का ठीक होने के बाद एक चिड़चिड़ा और झगड़ालु व्यक्ति में बदल गया। इस केस स्टडी पर काफी शोध के बाद यह निष्कर्ष निकला कि मस्तिष्क के अगले भाग से हमारा व्यक्तित्व तय होता है। बाद में चलकर यह अलग एक विषय बना जिसे लोबोटोमी कहा जाता है। इससे अवसाद जैसी बीमारियों का इलाज ढूंढने में भी मदद मिली।

1872 : चाल्र्स डार्विन ने मानव स्वभाव पर अपनी पुस्तक द एक्सप्रेशन ऑफ द इमोशन इन मैन एंड एनिमल में चेहरे के हावभाव पर विस्तार से बताया। सभी जानवरों में सिर्फ मनुष्य ही शर्माता है यह भी बताया।

1900 : सपने हमारे दिमाग में ही उत्पन्न होते हैं।
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