बिरजू महाराज जिन्होंने दी कत्थक को नई पहचान...

पद्मविभूषण से सम्मानित पंडित बिरजू महाराज भारतीय शास्त्रीय नृत्य 'कत्थक' के मशहूर कलाकार हैं। लखनऊ के कत्थक घराने में पैदा हुए बिरजू महाराज के पिता अच्छन महाराज और चाचा शम्भू महाराज का नाम देश के प्रसिद्ध कलाकारों में था।



उनका शुरुआती नाम बृजमोहन मिश्रा था। नौ वर्ष की आयु में पिता के गुजर जाने के बाद परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई फिर भी उन्होंने अपने चाचा से कत्थक नृत्य प्रशिक्षण लेना शुरू किया।

कुछ अरसे बाद कपिला वात्स्यायन उन्हें दिल्ली ले आईं. उन्होंने संगीत भारती (दिल्ली) में छोटे बच्चों को कत्थक सीखाना शुरू किया और फिर कत्थक केंद्र (दिल्ली) का कार्यभार भी संभाला।



उन्होंने कत्थक के साथ कई प्रयोग किए और फिल्मों के लिए कोरिओग्राफ भी किया. उनकी तीन बेटियाँ और दो बेटे हैं। कई पुरस्कारों के अलावा उन्हें पद्मविभूषण, संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड, कालिदास सम्मान व फ़िल्म 'विश्वरूपम्' में बेस्ट कोरिओग्राफी के लिए नेशनल अवॉर्ड दिया गया। उन्होंने दिल्ली में 'कलाश्रम' नाम से कत्थक संस्थान की स्थापना की।

बिरजू महाराज का नाम पहले दुखहरण रखा गया था. जिस अस्पताल में वो पैदा हुए, उस दिन वहाँ उनके अलावा बाकी सब लड़कियों का जन्म हुआ था, इसी वजह से उनका नाम बृजमोहन रख दिया गया. जो आगे चलकर 'बिरजू' और फिर 'बिरजू महाराज' हो गया.

कत्थक नृत्य बिरजू महाराज को विरासत में मिला. उनके पूर्वज इलाहाबाद की हंडिया तहसील के रहने वाले थे. यहां सन 1800 में कत्थक कलाकारों के 989 परिवार रहते थे. आज भी वहां कथकों का तालाब और सती चौरा है.

महाराज की अम्मा को उनका पतंग उड़ाना और गिल्ली-डंडा खेलना बिल्कुल पसंद नहीं था. जब अम्मा पतंग के लिए पैसे नहीं देतीं तो नन्हा बिरजू दुकानदार बब्बन मियां को नाच दिखा कर पतंग ले लिया करता.

मध्य काल में कत्थक का संबंध कृष्ण कथा और नृत्य से था. आगे चलकर मुग़ल प्रभाव आने से यह नृत्य दरबारों में बादशाहों के मनोरंजन के लिए किया जाने लगा.

गाँव में सूखा पढ़ने पर लखनऊ के नवाब ने उनके पूर्वजों को राजकीय संरक्षण दिया और इस तरह बिरजू महाराज के पूर्वज नवाब वाजिद अली शाह को कत्थक का प्रशिक्षण देने लगे.

भारत के आठ शास्त्रीय नृत्यों में सबसे पुराना कत्थक है. इस संस्कृत शब्द का अर्थ होता है कहानी सुनाने वाला. बिरजू महाराज की तबला, पखावज,नाल, सितार आदि कई वाद्य यंत्रों पर भी महारत हासिल है, वो बहुत अच्छे गायक, कवि व चित्रकार भी हैं।

बिरजू महाराज का ठुमरी, दादरा, भजन व ग़ज़ल गायकी में भी कोई जवाब नहीं है. कत्थक को अधिक लोग सीख पाएं इस उद्देश्य से पंडित बिरजू महाराज ने 1998 में कलाश्रम नाम से कत्थक केंद्र की स्थापना की।

महाराज जी ने सत्यजीत राय की 'शतरंज के खिलाड़ी' से लेकर 'दिल तो पागल है', 'ग़दर', 'देवदास', 'डेढ़ इश्क़िया', 'बाजीराव मस्तानी' जैसी कई फिल्मों में नृत्य निर्देशन किया है।

पंडित बिरजू महाराज की नाती (दायें से पहली) शिंजनी कुलकर्णी, पोते त्रिभुवन महाराज और पोती रागिनी महाराज भी उनकी कत्थक परंपरा को आगे ले जाने की तैयारी में हैं।
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