जाने खतरनाक और कुख्यात फूलन देवी (बैंडिट क्वीन ) के बारें में !

फूलन देवी जिन्हें बाद में बैंडिट क्वीन के नाम से पहचाना जाने लगा. इस महिला का जन्म 10 अगस्त 1963 में उत्तर प्रदेश के एक छोटे गांव में हुआ था. परिवार वालों ने कम उम्र में ही फूलन की शादी एक उच्च जाती के अधेड़ उम्र के व्यक्ति से कर दी थी. शादी के बाद पति रोज़ फूलन का बलात्कार और दुर्व्यवहार करता था, जिससे परेशान हो कर वे घर छोड़ कर भाग गई. लेकिन जब वे तीन वर्ष बाद अपने परिवार के पास वापस लौटीं तो पत्नी का धर्म न निभाने के चलते उन्हें सज़ा के तौर पर गांव के लोगों ने अपनी बिरादरी से बाहर कर दिया. फूलन की परिस्थितियां कुछ इस तरह की बन गई थी की मजबूरन उन्हें गलत रास्ता अख्तियार करना पड़ा.





1979 में फूलन पर किसी के घर से चोरी करने का आरोप लगाया गया, जिसके लिए उन्हें तीन दिन जेल में बिताने पड़े. इस दौरान उनके साथ हाथापाई की गई, पीटा गया और बलात्कार भी किया गया. इस तरह की घटनाओं ने फूलन में पुरुषों के प्रति नफ़रत पैदा कर दी. बाद में, डकैतों के एक गिरोह ने फूलन का अपहरण कर लिया और गिरोह के सरदार ने उनके साथ बलात्कार करने की कोशिश की, लेकिन गिरोह के ही एक सदस्य (विक्रम मल्लाह) ने उस व्यक्ति की हत्या कर फूलन को बचा लिया. इस घटना ने फूलन के दिल में विक्रम मल्लाह के लिए प्यार की भावना जगा दी. 


कुछ समय बाद फूलन उस गिरोह में शामिल हो गईं और विक्रम की दूसरी पत्नी बनी. एक रात गिरोह ने उस गांव पर हमला किया जहां फूलन का पूर्व पति रहता था. फूलन ने अपने पूर्व पति को घसीटते हुए घर से निकाला और गांव वालों के सामने ही उसकी पिटाई की. इसके बाद फूलन गिरोह की मुख्य सदस्य बन गईं. अब वे अपने हर अपराध को सफल अंजाम देने के बाद शुक्रिया करने के लिए दुर्गा मंदिर जाती थी.

उच्च जाति के दो लोगों ने विक्रम मल्लाह को मौत के घाट उतार दिया गया था और बैहमाई गांव के दंबगों ने फूलन को कैद कर उन्हें पीटा और उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया. लगभग तीन हफ़्तों बाद गांव के लोगों की मदद से फूलन वहां से भागने में कामयाब रहीं. इस घटना ने फूलन देवी के जीवन को पूरी तरह से बदल दिया था. 

फूलन ने मल्लाहों को जोड़ कर एक गिरोह बनाया और उत्तरी व मध्य भारत में कई लूट को अंजाम दिया. वे लूट के लिए उच्च वर्ग की जाति के लोगों को ही अपना शिकार बनाती थीं और लूट के सामान को किसी ‘रौबिन हुड’ की तरह निम्न वर्ग की जाति के लोगों में बांट देती थीं. 17 महिनों बाद, 14 फरवरी 1981 को वे बैहमाई गांव में वापस लौंटी और पुलिस अधिकारी की वर्दी पहन कर गांव में मार्च निकाला. उन्होंने उन लोगों को पहचान लिया था जिन्होंने उनके साथ पहले बलात्कार किया था. उन्होंने उन सभी ठाकुरों को एक लाइन में खड़ा कर गोलियों से भून दिया. इसके बाद ही उन्हें बैंडिट क्वीन के नाम से जाना जाने लगा.

फूलन देवी ने फरवरी 1983 में कुछ शर्तों के आधार पर आत्मसमपर्ण करने की घोषणा की थी. उनकी शर्तों को मान लिया गया, जिसके बाद फूलन ने 10 हज़ार लोगों, 300 पुलिसकर्मियों और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के सामने आत्मसमपर्ण किया था. उन पर 48 जघन्य आरोप लगाए गए, जिनमें से 30 चार्ज अपहरण के थे. उनका ट्रायल 11 साल तक चला और उतने समय तक उन्हें जेल में ही रहना पड़ा. 1994 में उन्हें ज़मानत मिली जिसके बाद उत्तर प्रेदश सरकार के लीडर मुलायम सिंह यादव ने उनके ऊपर लागए गए सभी अपराधों को हटा दिया. उसके कुछ समय बाद फूलन देवी समाजवादी पार्टी का हिस्सा बन गईं.

25 जुलाई 2001 को दिल्ली में मौजूद उनके अवास पर तीन नकाबपोश व्यक्तियों ने गोली मार कर फूलन देवी की हत्या कर दी थी. कुछ समय बाद यह बात सामने आई कि उनकी हत्या बदले की भावना से की गई थी.
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