समुद्र मंथन के बारे मे

राजा बलि की सहायता से ही देवराज इन्द्र ने समुद्र मंथन किया था।



समुद्र मंथन के दौरान इन्द्र ने असुरों के साथ हर जगह छल किया ताकि अमृत ग़लत हाथो मे ना चला जाए । जो 14 रत्न प्राप्त हुए उनका बंटवारा भी छलपूर्ण तरीके से ही संपन्न हुआ। हालांकि असुर यह सोचकर संतुष्ट हो जाते थे कि अपने को इन वस्तुओं से क्या लेना-देना? अपने को तो बस अमृत ही चखकर अजर-अमर हो जाना है। लेकिन जब अंत में अमृत निकला तो वहां भी उनके साथ छल हो गया। 
देवताओं और दैत्यों के बीच अमृत बंटवारे को लेकर जब झगड़ा हो रहा था, तब देवराज इन्द्र के संकेत पर उनका पुत्र जयंत अमृत कुंभ को लेकर भाग गया। तब कुछ दानवों ने उसका पीछा किया। अंत में विष्णु ने मोहिनी रूप लेकर अमृत बांटने का कार्य किया। इस दौरान विष्णु अपनी मायावी शक्ति से अमृत का कुंभ तब बदल देते थे, जब दानवों को बांटने की बारी आती। 
भगवान की इस चाल को राहु नामक दैत्य समझ गया। वह देवता का रूप बनाकर देवताओं में जाकर बैठ गया और प्राप्त अमृत को मुख में डाल लिया। जब अमृत उसके कंठ में पहुंच गया तब चन्द्रमा तथा सूर्य ने पुकारकर कहा कि ये राहु दैत्य है। यह सुनकर भगवान विष्णु ने तत्काल अपने सुदर्शन चक्र से उसका सिर गर्दन से अलग कर दिया। फिर भी अमृत के प्रभाव से उसके सिर और धड़ अलग-अलग रहकर भी अजर-अमर हो गए। उसके सिर का नाम तो राहु ही है, लेकिन उसके धड़ को केतु कहते हैं।
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