महाभारत से सम्बंधित वे स्थान जिनके बारे में जानकार आप रोमांचित हो जायेंगे

महाभारत को पंचम वेद कहा जाता है। महाभारत दुनिया का सबसे बड़ा ग्रन्थ है जिसमे सैकड़ो पात्र, कथाएं, विचित्रता तथा भौगोलिक, राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक घटनाएँ भी निहित है। लगभग 5200 वर्ष पुरानी महाभारत की कथा आज भी लोगों को रोमांचित करती रहती है। इसी से सम्बंधित कुछ ऐसे स्थान हम आपको बता रहे है जिनके बारे में आपने कही नहीं सुना होगा, तो आइये जानते है उन स्थानों के बारे में जो महाभारत से जुड़े हुए है।


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1. ज्योतिसर तीर्थ, कुरुक्षेत्र



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हरियाणा के कुरुक्षेत्र शहर से 6 किलोमीटर दूर ज्योतिसर तीर्थ ही वह स्थान है जहाँ पर भगवान् कृष्ण ने अर्जुन को मोह होने पर गीता का सन्देश दिया था। जिस वटवृक्ष के नीचे भगवान् कृष्ण ने गीता का सन्देश दिया था वह वटवृक्ष 5000 सालो से आज भी खड़ा है। आज भी यहाँ का पूरा क्षेत्र पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है। यहाँ पर महाभारत काल से जुडी हुई कई कलाकृतियाँ, शिलालेख और अन्य प्रमाण है।



2. हस्तिनापुर, मेरठ


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उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर में स्थित हस्तिनापुर महाभारत के समय का एक चर्चित स्थान रहा है। कुरुवंश की राजधानी हस्तिनापुर में ही थी। इसी हस्तिनापुर में कौरवो और पांडवो का बचपन बीता था जो बाद में द्वेष में बढ़ता रहा और अंत में महाभारत का युद्ध हुआ था। कुरुवंश का साम्राज्य उस समय बहुत अधिक विस्तृत था जो पुरे आर्यावर्त में सबसे शक्तिशाली साम्राज्य था।





3. ब्रह्मसरोवर कुरुक्षेत्र



कुरुक्षेत्र शहर के हृदय में बड़ा ब्रह्मा सरोवर पूरी दुनिया में अपने विशाल सरोवर और महाभारत के युद्ध के लिए प्रसिद्द है। ब्राह्मसरोवर के विशाल परिसर में कई बड़े विशाल और प्राचीन मंदिर है। यहाँ पर कई धर्मशालाएं भी है। ब्रह्मसरोवर से महाभारत की एक कथा जुडी हुई है की अर्जुन द्वारा जयद्रथ से युद्ध के समय जब सूर्यास्त का समय निकल रहा था तब भगवान् कृष्ण ने अपनी माया से सूर्य को बादलो में ढक दिया था जिससे सूर्यास्त का आभाष हो। उस समय अर्जुन ने प्रतिज्ञा की थी की अभिमन्यु के वध के दोषी जयद्रथ को यदि वे सूर्यास्त से पूर्व न मार पाए तो वे अग्नि समाधी ले लेंगे। दुर्योधन ने जयद्रथ को अभेद व्यूह में छुपा दिया था जिसे बाहर निकालने के लिए ये स्वांग रचा गया था। वास्तव में उस दिन सूर्य ग्रहण था इसलिए ऐसा प्रतीत हुआ की सूर्य अस्त हो गया हो।



4. इन्द्रप्रस्थ, दिल्ली


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भारत की राजधानी दिल्ली का पुराना नाम इन्द्रप्रस्थ है। यह नगर पांडवो द्वारा बसाया गया था। दिल्ली को यह नाम क्षत्रिय राजा दिलीप सिंह ढिल्लो के द्वारा मिला था। उससे पूर्व इसका नाम खांडवप्रस्थ था जो एक निर्जन और बंजर क्षेत्र था। पांडवो ने जब कौरवो से विवाद सुलझाने के लिए नयी राजधानी के लिए भूमि मांगी थी तो उन्हें यह निर्जन क्षेत्र मिला था पर पांडवो ने इसे संसार का सबसे भव्य नगर बना दिया था जिसका भव्यता का वर्णन महाभारत में है। दिल्ली का पुराना किला पांडवो के समय का ही है जो पांडवो द्वारा निर्मित है। कुछ समय पहले दिल्ली मेट्रो जामा मस्जिद के पास खुदाई में एक दिवार मिली थी जो पांडवकालीन थी पर उस पर आसपास के लोगों ने दुसरे धार्मिक स्थल में बदल दिया था। आज भी प्रगति मैदान के आसपास के क्षेत्र को इन्द्रप्रस्थ कहा जाता है।

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