जाने सप्तर्षियों में से एक विश्‍वामित्र ऋषि के बारे मे

सप्तर्षियों में से एक विश्‍वामित्र रामायण काल के ऋषि हैं। उनके काल में ही ऋषि वशिष्ठ थे और दोनों के बीच वर्चस्व की लड़ाई चलती रहती थी। ऋषि वशिष्ठ को देवताओं का साथ था। प्रजापति के पुत्र कुश, कुश के पुत्र कुशनाभ और कुशनाभ के पुत्र राजा गाधि थे। विश्वामित्रजी उन्हीं गाधि के पुत्र थे।
 


विश्वामित्र ऋषि बनने से पहले एक प्रतापी राजा थे। उनके मन में ऋषि बनकर ब्राह्मणत्व प्राप्त‍ करने की इच्छा हुई। इस इच्छा के चलते वे एक जगह पर तपस्यारत हो गए। उनकी तपस्या से घबराकर इन्द्र ने तपस्या भंग करने के लिए अप्सरा मेनका को भेजा। 
 
मेनका ने कई तरह के उपक्रम करने के बाद विश्वामित्र की तपस्या भंग कर उनके मन में काम उत्पन्न कर दिया। विश्‍वामित्र सब कुछ छोड़कर मेनका के प्रेम में डूब गए। जब इन्हें होश आया तो इनके मन में पश्चाताप का उदय हुआ। ये पुन: कठोर तपस्या में लगे और सिद्ध हो गए। सिद्ध होने के बाद काम के बाद क्रोध ने भी विश्वामित्र को पराजित कर दिया था, जब त्रिशंकु ने उनके समक्ष सशरीर स्वर्ग जाने की इच्छा प्रकट की थी।
 
इक्क्षवाकु वंश के राजा त्रिशंकु एक बार सशरीर ही स्वर्ग जाने की इच्छा लेकर अपने गुरु ऋषि वशिष्ठ के पास गए लेकिन वशिष्ठ के मना करने पर वे उनको भला-बुरा कहने लगे। वशिष्ठजी के पुत्रों ने रुष्ट होकर त्रिशंकु को चांडाल हो जाने का शाप दे दिया। तब त्रिशंकु विश्‍वामित्र के पास गए। विश्‍वामित्र ने कहा ‍कि मेरी शरण में आए व्यक्ति की मैं अवश्य ही मदद करता हूं। तब विश्‍वामित्र उन्हें स्वर्ग भेजने के लिए यज्ञ की तैयारी करने लगे।
 
यज्ञ की समाप्ति पर विश्वामित्र ने सब देवताओं का नाम ले-लेकर उनसे अपने यज्ञ भाग को ग्रहण करने के लिए आह्वान किया किंतु कोई भी देवता अपना भाग लेने नहीं आया। इस पर क्रुद्ध होकर विश्वामित्र ने अर्घ्य हाथ में लेकर कहा कि हे त्रिशंकु! मैं तुझे अपनी तपस्या के बल से स्वर्ग भेजता हूं। इतना कहकर विश्वामित्र ने जल छिड़का और राजा त्रिशंकु शरीर सहित आकाश में चढ़ते हुए स्वर्ग जा पहुंचे। त्रिशंकु को स्वर्ग में आया देख इन्द्र ने क्रोध से कहा कि रे मूर्ख! तुझे तेरे गुरु ने शाप दिया है इसलिए तू स्वर्ग में रहने योग्य नहीं है। इन्द्र के ऐसा कहते ही त्रिशंकु सिर के बल पृथ्वी पर गिरने लगे और विश्वामित्र से अपनी रक्षा की प्रार्थना करने लगे। विश्वामित्र ने उन्हें वहीं ठहरने का आदेश दिया और वे अधर में ही सिर के बल लटक गए। 
 
तब विश्वामित्र ने उसी स्थान पर अपनी तपस्या के बल से स्वर्ग की सृष्टि कर दी और नए तारे तथा दक्षिण दिशा में सप्तर्षि मंडल बना दिए। इसके बाद उन्होंने नए इन्द्र की सृष्टि करने का विचार किया जिससे इन्द्र सहित सभी देवता भयभीत होकर विश्वामित्र से अनुनय-विनय करने लगे। वे बोले कि हमने त्रिशंकु को केवल इसलिए लौटा दिया था कि वे गुरु के शाप के कारण स्वर्ग में नहीं रह सकते थे। इन्द्र की बात सुनकर विश्वामित्रजी बोले कि ठीक है और यह स्वर्ग मंडल हमेशा रहेगा और त्रिशंकु सदा इस नक्षत्र मंडल में अमर होकर राज्य करेगा। इस मंडल का कोई इन्द्र नहीं होगा। इससे संतुष्ट होकर इन्द्रादि देवता अपने-अपने स्थानों को वापस चले गए। 
 
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