15 अजीबोगरीब गुत्थियां जिन्हे विज्ञान अभी तक नहीं जाना पाया - जाने

इस पर विश्वास करना थोड़ा कठिन है, पर यह सच के ज़्यादा करीब है कि आज भी दुनिया में कुछेक ऐसी चीज़ें हैं जो विज्ञान और वैज्ञानिकों से परे बनी हुई हैं. जैसे आसमान में कोई विद्युतीय गोला क्यों दिखलाई पड़ता है? या फिर कोई 700 पाउंड का बेहद भारी पत्थर बिना किसी इंसान और जानवर की मदद से कैसे लुढ़कता चला जाता है? क्या यह हमारे लिए हमेशा कोई गुत्थी ही बनी रहेंगी या फिर हम इन्हें सुलझा लेंगे? बहरहाल, पेश हैं देश-दुनिया की कुछ ऐसी ही गुत्थियां जो आज भी मानवमात्र के लिए किसी रहस्य की तरह हैं...


1. भूकंप से निकलने वाली रोशनी




पिछली कई सदियों से ऐसा देखने में आता रहा है कि किसी भारी भूकंप से पहले अलग-अलग जगहों पर भारी प्रकाश हो जाता है. सन् 1960 से पहले लोगों ने तो इसे सिर्फ़ देखा ही था मगर सन् 60 में किसी ने इसकी तस्वीर भी खींच ली. यह पूरा मामला सिर्फ़ चंद सेकेंडों के लिए देखने को मिलता है. वैज्ञानिक इसके लिए पाइज़ोइलेक्ट्रिसिटी, घर्षण से उठने वाली रोशनी और इलेक्ट्रोकाइनेटिक्स को वजह मानते हैं, मगर अब तक वे किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाए हैं.



2. ज्वालामुखीय रोशनी

वैज्ञानिकों ने ऐसा पाया है कि जैसी रोशनी भूकम्प से ठीक पहले देखने को मिलती है वैसी ही रोशनी ज्वालामुखी के फटने से पहले देखे जाते हैं. हालिया अध्ययन की मानें तो यह बड़े-बड़े पत्थरों के टकराने और घर्षण का परिणाम है.




3. चंद्रमा भ्रम



कहा जाता है कि चांद जब क्षितिज पर होता है तो यह सामान्य से ज़्यादा बड़ा दिखलाई पड़ता है. मगर वही चांद जब आसमान में ऊपर होता है तो उसमें कोई परिवर्तन नहीं दिखलाई पड़ता. हालांकि थ्योरियां तो कई हैं जो ऐसा दावा करती हैं कि ऐसा क्यों होता है, मगर किसी के पास भी कोई ठोस जानकारी नहीं है.




4. सूरज को कोरोना या फिर मुकुट


कोरोना शब्द दरअसल लैटिन से आया है जिसका अंग्रेजी शब्द Crown होता है और हिन्दी में उसे मुकुट कहते हैं. यह वह प्रकाश है जो सूर्य को घेर लेता है. वैज्ञानिकों के लिए यह आज भी एक गुत्थी है कि यह कोरोना क्यों सूर्य की सतह से भी ज़्यादा गरम होता है? जब सूर्य के सतह की गर्मी का तापमान 5800 केल्विन होता है तो वैसे समय पर कोरोना का तापमान 10 से 30 लाख केल्विन क्यों होता है? क्यों सोचने वाली बात है कि नहीं?




5. जेलीफिश झील से जेलीफिश का एकदम से गायब हो जाना


पलाउ के आइल मल्क द्वीप के इस झील का नाम कभी जेलीफिश झील हुआ करता था. यह झील एक समुद्री झील है और यह सोतों और बांधों के माध्यम से समुद्र से जुड़ा है. पहले यहां लाखों की संख्या में जेलीफिश देखी जाती थीं मगर सन् 1998 से 2000 के बीच जाने ऐसा क्या हुआ कि इस रास्ते एक भी जेलीफिश नहीं आईं, और वैज्ञानिक इसके पीछे की वजह आज भी नहीं खोज पाए हैं.



6. बर्फीय वृत्त



इन्हें बर्फ का गोला और तश्तरी भी कहते हैं, बर्फीय वृत्त वह दुर्लभ प्राकृतिक संरचना है जो धीमे बहने वाले जल में और बर्फ जमा देने वाले तापमान में होता है. वैज्ञानिक आज तक इस बात को नहीं जान सके हैं कि ऐसा किस प्रकार संभव होता है. मगर यदि लोगों की मानें तो वे एडी करेन्ट्स की वजह से पैदा होते हैं जहां पतली-पतली प्लेटनुमा बर्फ पैदा होती है और धीरे-धीरे और ठंडी हो जाती है. इन बर्फीले वृत्तों का व्यास एक फीट से लेकर 50 फीट तक हो सकता है.



6. बिगफुट


पिछले कई दशकों से देश-दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में लोगों ने ऐसा दावा किया है कि उन्होंने एक भारी-भरकम और ढेर सारे बालों वाला जानवर देखा है, और उसके पूरे शरीर के साथ-साथ उसका पैर भी बहुत बड़ा है. कुछ लोग इस यति भी कहते हैं, हालांकि हिन्दू धर्म ग्रंथों की मानें तो ऐसे जीव वास्तविक हैं और हिमालय की कंदराओं में देखे जाते हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसे सारे जीव लाखों साल पहले खत्म हो चुके हैं और आज उनकी बात करना भी बेमानी है.



8. शनि ग्रह का तूफ़ान



शनि नाम मात्र से ही पूरा हिन्दू समाज रोमांचित हो उठता है. शनि को विनाश और बिगाड़ का देवता कहा जाता है. मगर इधर वैज्ञानिकों ने सन् 2013 में शनि ग्रह की सतह पर एक भारी तूफ़ान देखा था. यहां उस तूफ़ान की तीव्रता 530 किमी प्रति घंटा थी. पृथ्वी पर तो समुद्र एक बड़ी वजह है कि यहां भारी तूफ़ान उठते हैं मगर शनि ग्रह पर ऐसी कोई वजह नहीं दिखलाई पड़ती.



9. जंतुओं की बारिश



अब तक इस दुनिया में ऐसे कई वाकये हुए हैं जब आसमान से जीव-जंतु टपके हैं, मगर 2000 की गर्मियों में कुछ ऐसा हुआ कि पूरी दुनिया दंग रह गई. दरअसल यहां की सड़कों पर एकाएक मछलियां बरसने लगीं. कहने वाले कहते हैं कि तूफ़ान किसी जगह पर आकर इस कदर संकुचित हो जाते हैं कि वे वहां से जीवों को उठा ले जाते हैं, और इस तरह के तूफ़ान में कोई एक प्रकार के ही जीव बरसते हैं जैसे मछली, मेंढक और झींगे.



10. नागा फायरबॉल्स



यह एक अजीबोगरीब घटना है. लाओस और थाइलैंड को मेकौंग नदी के ऊपर एक लाल पिंड उभरता नज़र आता है जो पानी के भीतर से ही निकलता दिखाई देता है. अब तक वैज्ञानकों ने ऐसी पूरी कोशिश की है कि वे इस गुत्थी को सुलझा सकें मगर अफ़सोस.



11. ब्रम्हांड की शुरुआत



कहा जाता है कि ब्रम्हांड की शुरुआत के पीछे बिगबैंग थ्योरी ही कारण है. कहा जाता है कि आज से लगभह 14 बिलियन वर्ष पूर्व पूरा ब्रम्हांड एक ही इकाई था. हालांकि यह थ्योरी सारी गुत्थियां नहीं खोलती कि बिगबैंग से पहले ब्रम्हांड का स्वरूप क्या था? अब यह भी तो एक रहस्य ही है, है कि नहीं?



12. बरमूडा ट्राएंगल



यह जगह अब तक न जाने कितने पानी के जहाजों और हवाई जहाजों को ख़ुद में समाहित कर चुका है? कहते हैं कि इसके नज़दीक जाने वाला कोई भी वापस लौट कर नहीं आ सका. दक्षिण अटलांटिक सागर के पश्चिमी हिस्से में स्थित यह रहस्यमयी जगह आज भी एक अनसुलझी गुत्थी है. वैज्ञानिक इसके पीछे मिथेन गैस के तूफ़ान, समंदर के तूफ़ान, मानवीय गलतियां और न जाने क्या-क्या वजह बताते हैं मगर ये सारी बातें लोगों के गले नहीं उतरतीं. हालांकि कई लोग चुंबकीय दाब को भी एक बड़ी वजह बताते हैं. अब बाकी सच्चाई तो ईश्वर ही जाने.




13. परीय गोलपिंड



दक्षिण अफ्रीका के घास के मैदानों में पाए जाने वाले यह परीय गोलपिंड ख़ुद में ही एक आश्चर्य हैं. ये वृत्तनुमा घसियल गोलपिंड 2 से 14 मीटर व्यासीय लंबाई के हो सकते हैं. वैज्ञानिक इस बात का पता अब तक नहीं लगा पाए हैं कि यह किस प्रकार निर्मित हो जाता है? कुछ लोगों का मानना है कि ज़मीन में रहने वाले दीमक इसे निर्मित करते हैं मगर इसका कोई पुख़्ता सबूत नहीं है.




14. पिंडीय रोशनी



यह शायद अब तक की सबसे अधिक उलझाने वाला गुत्थियों में से एक है. इसमें एक छोटे मटर के दानें से लेकर कई मीटर तक के पिंड शामिल हैं. हालांकि इसके उत्पन्न होने की वजह तूफ़ानों को माना जाता है. यह पूरी प्रक्रिया किसी सामान्य बिजली चमकने से लंबे समय तक चलती है. सन् 1834 से ही इस पूरे प्रकरण पर शोध चल रहा है मगर वैज्ञानिकों के लिए आज भी यह एक उलझन ही बना हुआ है.




15. हेसडालेन रोशनी



सन् 1940 से या फिर उसके पहले से ही इस विषय पर शोध हो रहा है कि इस रोशनी के उठने का वाजिब कारण क्या हैं? यह रोशनी कभी पीले तो कभी सफेद रंग का होता है. सन् 1981 से 1984 के बीच यह रोशनी लगभग सप्ताह में 20 बार देखी जा सकती थी. आज इसे साल में 10 से 20 बार देखा जा सकता है. कई तरह के शोधों और अध्ययन के बावजूद आज भी यह गुत्थी और रोशनी अनसुलझी है.
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आख़िर प्रकृति से बड़ा कलाकार कोई और नहीं.
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