जहाँ मिली थी परशुराम जी को मातृ-हत्या के पाप से मुक्ति - परशुराम कुण्ड - अरुणाचल प्रदेश

आज इस लेख में हम आपको परशुराम कुण्ड के बारे में जानकारी दे रहे है, पर आइए पहले जानते की परशुराम जी ने आखिर क्यों अपनी माता की हत्या की थी ?

परशुराम कुण्ड 



आखिर क्यों किया भगवान परशुराम ने अपनी माँ का वध - 




परशुराम भगवान विष्णु के आवेशावतार थे। उनके पिता का नाम जमदग्नि तथा माता का नाम रेणुका था। परशुराम के चार बड़े भाई थे लेकिन गुणों में यह सबसे बढ़े-चढ़े थे। एक दिन गन्धर्वराज चित्ररथ को अप्सराओं के साथ विहार करता देख हवन हेतु गंगा तट पर जल लेने गई रेणुका आसक्त हो गयी और कुछ देर तक वहीं रुक गयीं। हवन काल व्यतीत हो जाने से क्रुद्ध मुनि जमदग्नि ने अपनी पत्नी के आर्य मर्यादा विरोधी आचरण एवं मानसिक व्यभिचार करने के दण्डस्वरूप सभी पुत्रों को माता रेणुका का वध करने की आज्ञा दी। लेकिन मोहवश किसी ने ऐसा नहीं किया। तब मुनि ने उन्हें श्राप दे दिया और उनकी विचार शक्ति नष्ट हो गई। अन्य भाइयों द्वारा ऐसा दुस्साहस न कर पाने पर पिता के तपोबल से प्रभावित परशुराम ने उनकी आज्ञानुसार माता का शिरोच्छेद कर दिया। यह देखकर महर्षि जमदग्नि बहुत प्रसन्न हुए और परशुराम को वर मांगने के लिए कहा। तो उन्होंने तीन वरदान माँगे-

माँ पुनर्जीवित हो जायँ,
उन्हें मरने की स्मृति न रहे,
भाई चेतना-युक्त हो जायँ और

जमदग्नि ने उन्हें तीनो वरदान दे दिये। माता तो पुनः जीवित हो गई पर परशुराम पर मातृहत्या का पाप चढ़ गया।


परशुराम कुण्ड (Parshuram Kund) :-

मान्यता है की जिस फरसे से परशुराम जी ने अपनी माता की हत्या की थी वो फरसा उनके हाथ से चिपक गया था। तब उनके पिता ने कहा की तुम इसी अवस्था में अलग-अलग नदियों में जाकर स्नान करो , जहाँ तुम्हें अपनी माता की हत्या के पाप से मुक्ति मिलेगी वही यह फरसा हाथ से अलग हो जाएगा। पिता की आज्ञा अनुसार उस फरसे को लिए-लिए परशुराम जी ने सम्पूर्ण भारत के देवस्थानों का भ्रमण किया पर कही भी उस फरसे से मुक्ति नहीं मिली। पर जब परशुराम जी ने आकर लोहित स्तिथ इस कुण्ड में स्नान किया तो वो फरसा हाथ से अलग होकर इसी कुण्ड में गिर गया। इस प्रकार भगवन परशुराम अपनी माता की हत्या के पाप से मुक्त हुए और इस कुण्ड का नाम परशुराम कुण्ड पड़ा।

परशुराम कुण्ड को प्रभु कुठार के नाम से भी जाना जाता है। यह अरुणाचल प्रदेश के लोहित जिला की उत्तर-पूर्व दिशा में 24 किमी की दूरी पर स्थित है। लोगों का ऐसा विश्वास है कि मकर संक्रांति के अवसर परशुराम कुंड में एक डूबकी लगाने से सारे पाप कट जाते है। समय के साथ यह स्थानीय लोगों के साथ-साथ पर्यटकों में भी लोकप्रिय हो गया। अब यह कुण्ड लोहित की पहचान बन चुका है।

मकर सक्रांति पर स्नान करने के लिए उमड़े श्रद्धालु 

हजारों तीर्थयात्री प्रतिवर्ष 14 जनवरी को मकर संक्रान्ति के दिन इस कुण्ड में स्नान करने आते हैं। अरूणाचल प्रदेश ही नहीं वरन् समूचा उत्तरपूर्व, नेपाल और भूटान तक का श्रध्दालु समाज मकर संक्रांति पर्व के समय इस कुण्ड पर सहज खिंचा चला आता है। जनवरी मास में प्रत्येक वर्ष जो आस्था-सैलाब यहां उमड़ता है उसकी तुलना यहां पर महाकुंभ से की जाती है।
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